कौन ज्यादा मानव? कौन ज्यादा संतोष में? कौन सही में भारतीय?

यह एक छोटी से घटना भारतीय गाँव और उनके मन के बारे में सबकुछ बता देती है…कमी में छिनना — झपटना नहीं, संतोष से निर्वहन करना, मेहनत करना। निश्चय ही इनके भोले चरित्र का कुछ शोषण भी हो रहा है, फिर भी ज्यादा मानव कौन? ज्यादा दया किसमें?

एक दूसरा वर्ग भी है, हम जैसे कुछ लोगों का जो सबकुछ मफ्त चाहता है, और अगर नहीं मिलेगा तो नोच-नोच कर ले लेंगे…अराजक हो जायेंगे, हिंसा पर उतर आयेंगे। आपको देना पड़ेगा …नहीं दोगे तो सड़क जाम कर देंगे, गालियाँ देंगे, कैद कर लेंगे, दीवारें रंग देंगे। हमारी हड्डियों में इस अम्मा से ज्यादा जान है तो क्या…उस जान का इस्तेमाल स्वालंबन के लिए करेंगे …नहीं ! उसका इस्तेमाल यह बताने के लिए करेंगे की अगर आप नहीं दोगे तो आपका जीना मुश्किल कर सकते हैं हम।

वैसे अम्मा को भी यही करना चाहिए। सड़क पर उतर आएँ, अपने जैसे और लोगों के साथ…भले कमजोर हड्डियों से बैरिकेड नहीं तोड़ सकते पर गालियाँ तो निकल ही सकती है न? समाज उसके लालन-पालन का बोझ नहीं उठा रही इसलिए, आजादी के ७० सालों के बाद भी गरीबी क्यों है इसलिए। पर नहीं नहीं…अम्मा के मुँह से गालियाँ नहीं निकलेगी, अपने समाज के लोगों के लिए, अपने ही लोगों के लिए…नहीं नहीं..छिः छिः! पर फिर भी कम-से-कम सड़क पर जमे तो रह ही सकते हैं, कम-से-कम जिस समाज से मांग रहे हैं उनका कुछ तो नुकसान हो। नुकसान से अम्मा को याद आएगा…अरे..रे.रे…आज सिंघाड़े नहीं निकालने से कितना नुकसान हो जायेगा और वो गौरी और देवकी…उसकी गाएँ वो बेचारी तो भूख से परेशान हो जाएँगी। और गौरी की नवजात बछिया भी हैं,कितने लाड़ से गौरी चाटती है उसके कपाल को, उन माँ-बच्चे को एक दिन नहीं मिलाया तो रम्भा-रम्भा कर जान ही हत देंगी। नहीं …नहीं अम्मा का हृदय से ऐसा पत्थर-दिल काम नहीं हो पायेगा। वो नहीं जाएगी सड़क पर मोर्चा कसने, लोगों को भला-बुरा कहने। वैसे भी उससे कौन सा कुछ होना है, होता तो करने से है।अम्मा गर्व से पुल्कित हो जाएगी और स्वाभिमानी ह्रदय से हमसे कहेगी, “बेटा! इन बूढ़ी हड्डियों में अभी भी इनती जान बाकी है कि मैं अपना दाना-पानी देख लूँ और तो और गौरी और देवकी को भी भूखे नहीं रहने दूंगी कभी।” अम्मा इस बात का इंतज़ार भी नहीं करेगी की किसने उसकी बातों को सुना और किसने क्या कहा, वो चली जाएगी इस विचार सी कि किसी दिन फिर हम अम्मा को फिर मिल जायेंगे..उसके हाथ से सिंघाड़े खाने। वो तो इस बात पर भी सोचेगी तक नहीं कि हम जैसे कुछ लोग जो कुछ युगों से बेतहाशा गरीबी का समाधान ढूंढने में लगे हैं, जो गरीबी पर एक के बाद एक ग्रन्थ रचे जा रहे हैं, वो किसी दिन सही में गरीबी दूर करने का नुस्खा ढूंड पाएंगे या नहीं।

हम, युवा देश के मजबूत युवा, ३०-४० की उम्र तक पढेंगे कि गरीबी क्या है, क्यूँ है, कब तक रहेगी और और बीच-बीच में सरकार और जो अपनी बात से सहमत न हो उन्हें गलियाते रहेंगे। २० रुपये का समोसा ४ रुपये में लाल चटनी में डुबाकर, मुँह में दबाते हुए , फ्री के इन्टरनेट पर एक बढ़िया लेख लिखेंगे की कैसे सरकार हम जैसे हट्ठे-कट्ठठे गरीबों को समोसे का दाम ६ रुपये करके भूखे मार डालना चाहती है। फिर सड़क पर चीखेंगे कि हाथ-पैर, दिमाग-बुद्धि तो सब पहले से थी, सरकार ने कुछ दिया ही नहीं, सरकार दे फिर हम नुस्खे पर काम आगे बढ़ाये. फिर किताब छपे, लोग पढ़े कि कैसे भारतीय गाँव के गरीब लोग अपने गरीबी पर चिल्लम-पट्टी नहीं मचा रहे हैं. मचाने से ही तो गरीबी दूर होगी। फिर विदेश में जाकर बताएँगे कि देखो भाई, हमारे देश में बहुत गरीबी। जब पूछा जायेगा की आपने क्या किया लोगों की गरीबी दूर करने को, तो बताएँगे समोसे खाए और किताब लिखा पर क्या किया जाये लोगों में असंतोष ही नहीं है कि वो गरीब हैं, हमने तो इस असंतोष को बढ़ाने की पूरी कोशिश की है।

खैर, अम्मा फिर भी दो-चार सिंघाड़े यूँही बाँटती रहेगी। अम्मा सड़क पर भी नहीं आएगी, लोगों से छिना-झपटी भी नहीं करेगी। अम्मा स्वाभिमानी जो ठहरी। उसके इस भोलेपन का लोग लाभ भी उठाएंगे, कुछ लोग खरीदने के बहाने सही में जितना अटे उतना मुँह में और दो-चार सिंघाड़े हाथ में उठा ले जायेंगे। पर फिर सवाल वही रह जाता है, कौन ज्यादा मानव? कौन ज्यादा संतोष में? कौन सही में भारतीय?

Mostly from experience - of tribal Jhabua, and the struggle of learning 'selfless passionate dedication for people'.

Mostly from experience - of tribal Jhabua, and the struggle of learning 'selfless passionate dedication for people'.